२३,२४,२५,२६ जनवरी २०१० को क्या किया आपने। बिग बाजार से लेकर सारे बाजार में ये चार दिन सबसे सस्ते थे! ये हम नहीं कह रहे, उन दिनों, अखबारों में छपे विज्ञापनों की यह भाषा है। तो अगर ये सबसे सस्ते दिन थे तो क्या आपने खरीददारी की? इन मॉल वालों ने जिस तरह से विज्ञापनों पर पैसे लुटाए, उससे लगता है कि 'माल खूब बिका होगा। लेकिन जरा मेरी आपबीती सुन लें। २६ जनवरी को घर में आराम से सोने के बाद २७ जनवरी को बीआरटी कॉरिडोर की बस में दो सज्जन टकराए। उनमें एक एलजी, गोदरेज के सामान बेचने का काम करते थे, जबकि दूसरा किसी शॉपी १८ वाले सेंटर में। शॉपी वाला कह रहा था, 'यार, हालत यह हो गई है कि डीलर प्राइस पर सामान बेचना पड़ रहा है और उसमें भी मुसीबत है। दूसरे ने जवाब में कहा, 'परसों मैंने अपने सीनियर को बॉस से खूब डांट पिलाई। हुआ ये कि मैंने एक ग्राहक को वेब कैम फाइनल कर दिया। इतने में मेरा सीनियर आकर उसे फिर से वेब कैम घुमाकर दिखाने लगा। मैंने बॉस से जाकर कहा कि ग्राहक तैयार है, अब ये फिर से माल के बारे में बता रहा है, गड़बड़ी हुई तो मेरी जिम्मेदारी नहीं। उस लड़के की भाषा में बॉस ने उस सीनियर की जमकर 'ली और उसे ग्राउंड फ्लोर पर जाने से मना कर दिया। आप भी मुझसे इत्तफाक रखेंगे कि अगर उन दोनों सेल्स पर्सन की आपसी बातचीत सही थी तो नई दिल्ली में कंज्यूमर गुड्स सेक्टर कितने अच्छे हालात से गुजर रहा है।
पहले तो ये समझें कि सबसे सस्ते ४ दिन ही क्यों?
पांच दिन क्यों नहीं, या तीन दिन क्यों नहीं। इसका सरल जवाब है-२३ जनवरी को शनिवार था और २६ जनवरी को मंगलवार। सरकारी, अद्र्घसरकारी, कॉरपोरेट, आईटी सेक्टर से जुड़े नौकरीपेशेवरों ने अगर सोमवार की छुट्टी की तो वे इसका मतलब हुआ कि उन्होंने पूरे चार दिन की छुट्टी एक साथ ली। इस कड़क सर्दी में वे लांग टूर का प्रोग्राम तो बना नहीं सकते थे, अलबत्ता वे मॉल्स जाकर सिनेमा का लुत्फ जरूर ले रहे थे विद फैमिली। तो भैया जब आप मॉल जा रहे हैं सिनेमा देखने तो मॉल में बैठा बिग बाजार आपको देखकर लार तो टपकाएगा नहीं, बल्कि उल्टा वह आपके मुंह से लार टपकाकर अपनी जेब भरेगा। सो तमाम बड़े रीटेल शॉप्स ने कहा- सबसे सस्ते ४ दिन! लेकिन बिक्री कितनी हुई होगी इनकी, इसका अंदाजा सेल ब्वॉयज की उपर्युक्त बातचीत से आप लगाएं।
सस्ता कुछ नहीं होता, बस 'महंगा थोड़ा कम होता है
एक चीज आप गांठ बांध लें कि दुकानदार को मुनाफा छोड़ कुछ और सुनाई नहीं देता। ऐसे में वे सस्ती सर्विस आपको कैसे दे सकते हैं। और यह भी सच है कि आपकी समझ में आ जाए कि महंगा है तो आप जरूरी होने पर भी सामान नहीं खरीदेंगे। ऐसे में बाजार क्या नुस्खे अपनाता है। आइए कुछ उदाहरणों से समझते हैं।
पहले १० रामबाण समझ लें बाजार के।
पहला, वह चुपके से मात्रा कम करता चला जाता है।
दूसरा, पैकेट्स छोटे-से-छोटा होते चले जाते हैं।
तीसरा, वह चालाकी से गुणवत्ता में कमी करता चला जाता है और आपको इसकी भनक भी नहीं लगने देता।
चौथा, वह ब्रांड एंबेसेडर के सहारे माल खरीदने के लिए आपको मजबूर करता है। आप ये न सोचें कि ब्रांड एंबेसेडर केवल आमिर खान या अमिताभ होते हैं, ब्रांड एंबेसेडर हेल्थ केयर फाउंडेशन और इंडियन डेंटल एसोसिएशन भी होते हैं।
पांचवां, आकर्षक, सेक्सी और मादक विज्ञापनों से वह आपके अद्र्घचेतन में दबी सेक्स-इच्छा को सामान के यूज से जोड़ देता है। अमूल माचो का विज्ञापन याद है, हाईड एंड सिक बिस्किट के विज्ञापन में रितिक रौशन और लड़की के मादक डांस देख आपके पैर नहीं थिरकते क्या!
ंछठा, जब यह तीर भी चुक जाता है तो भारी-भरकम ऑफरों की बरसात कर देता है। आपको लगता है लूट मची है, लेकिन याद रखें ८०+२० प्रतिशत की छूट के बावजूद दुकानदार का एसी हमेशा ऑन रहता है। यानी तब भी वह घाटे में नहीं है!
सातवां, बाजार दाम तो नहीं घटाता है लेकिन रीटेल शॉपर्स की मार्जिन मनी बढ़ा देता है। नतीजा यह होता है कि ज्यादा मार्जिन वाले सामान की भरमार हो जाती है उस दुकान में, जहां से आप महीने भर के लिए उधारी सामान ले जाते हैं। जब उधार में सामान लेना है तो जाहिर है आपकी नहीं चलेगी, दुकानदार की चलेगी। आप शंका करेंगे तो दुकानदार अपनी गारंटी पर सामान देगा, आप कैसे इंकार करेंगे?
आठवां, डोर ऑप्शन तो खुला पड़ा है गृहिणियों को लुभाने के लिए।
नौवां, रात के १२ बजे के बाद कमोबेश सभी एंटरटेनमेंंट और छुटभैये न्यूज चैनलों पर आपको सामान चूज करके फोन करने को कहा जाता है। बताया जाता है कि इससे कितना फायदा होगा आपको। और हां, यह भी होम डिलेवरी वाला ऑप्शन है।
दसवां, साझेदारी का विकल्प!
अब आइए जरा सेग्मेंट वाइज ये समझते हैं कि बाजार कैसे आपकी गाढ़ी कमाई चुराता है और आपको पता भी नहीं चलता।
मात्रा/भार/वजन/इनग्रेडिएंट्स का गड़बड़झाला
आज से कुछ साल पहले तक किलोग्राम १००० ग्राम का होता था। बाद में वह जब लिटर में कन्वर्ट हुआ तो घटते-घटते ९०० ग्राम का हो गया। अब जो आप एक लिटर सरसों तेल या घी आदि खरीदते हैं वह १०० ग्राम कम खरीदते हैं यानी कायदे से १०० ग्राम की ज्यादा मात्रा के पैसे चुकाते हैं।
आप साबुन को लें। उसके इंग्रेडिएंट्स में ञ्जस्नरू (टोटल फैट मैटर) की प्रमुख भूमिका होती है। टोटल फैट मैटर का आपके लिए अर्थ ये है कि ये ञ्जस्नरू जितना ज्यादा होगा, साबुन उतना ही मुलायम होगा। यानी वह आपकी स्किन के लिए उतना ही लाभकारी होगा। ये ञ्जस्नरू ७६ प्रतिशत हो तो समझें आपकी स्किन को इससे नुकसान नहीं पहुंचेगा, इससे ज्यादा हो तो समझें कि इससे त्वचा की नमी बनी रहेगी। जैसे कि डव साबुन।
अभी पिछले कुछ दिनों पहले से कहा जा रहा है कि डेटॉल साबुन स्वाइन फ्लू से लडऩे में मददगार है। सही-गलत तो भगवान जानें, लेकिन इसका ञ्जस्नरू शायद ही कभी ७६ प्रतिशत को टच करता है। नॉर्मली यह ७१ प्रतिशत पर अटका रहता है।
छोटे पैकेट्स
अभी विज्ञापन में शाहरुख खान कह रहे हैं मर्दों की सख्त त्वचा के लिए दुनिया का नंबर वन ब्रांड फेयनेस क्रीम मात्र ७ रुपये में! आप बस उस पैकेट पर ध्यान दें, जो उनके हाथ में है। उसका आकार अब तक का सबसे छोटा है। गांवों में शैंपू, सर्फ, फेयर एंड लवली, लिप गार्ड आदि ५० पैसे से लेकर १ रुपये के सैशे में मिल रहा है। रीजन साफ है अगर ग्राहक के पास केवल ५० पैसे हैं तो बाजार ५० पैसे में ही सैशे तैयार
करके उसके घर पर हाजिर है। मात्रा कभी ३.५ मिलीलिटर तो कभी ५ मिलीलिटर तो कभी ७ मिलीलिटर। इसलिए सोच लें कि सस्ता पड़ा या महंगा। चिक और डाबर वाटिका- ये दो ऐसे शैंपू हैं जो ग्रामीण बाजार में ५० पैसे में भी उपलब्ध हैं। और हां, इसके खरीददारों की कमी नहीं है।
गुणवत्ता में कमी
पहले तो आप जान लें कि अगर आप रोजना अखबार खरीदते हैं तो निवेशक तो हैं ही आप। अब इस पर मेरी जानकारी लें कि पिछले एक साल से मंदी और घटते विज्ञापनों के नाम पर अधिकांश बड़े अखबारों के एक्सट्रा पेजेज घटा दिए गए, उनके पेजेज की क्वालिटी घटा दी गई, लेकिन दाम जरूर बढ़ा दिए गए। २००९-१० की तीसरी तिमाही के हिंदुस्तान आदि के आर्थिक रिजल्ट बताते हैं कि वे घाटे में नहीं रहे, बल्कि उनकी विज्ञापनों से हुई बढ़ी, तो ऐसे में पेपर के दाम बढ़ाने का क्या औचित्य था। आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूं।
ब्रांड एंबेसेडर की भारी कीमत आप अदा करते हैं
इसे समझने के लिए सिर्फ एक उदाहरण दूंगा कि वर्तमान वित्त सत्र की दूसरी तिमाही में हिंदुस्तान लीवर जैसी कुज्यूमर और प्रीमियर गुड्स निर्माता कंपनी की जितनी आय थी, उससे ज्याद रकम उन्होंने विज्ञापनों पर खर्च किए थे। आप सिर्फ यह तर्क करें कि हिंदुस्तान लीवर जैसी ब्रांडेड कंपनी अपनी आय से ज्यादा ब्रांडिंग पर खर्च करे तो यह आपके साथ ज्यादती नहीं है? फर्ज करें कि इन कंपनियों को १०० में १० रुपये का शुद्घ लाभ हुआ यानी कि इन्होंने कम-से-कम ११ रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए। तो हम-आप ग्राहकों की जेब से तो २० रुपये ज्यादा निकल गए न १०० रुपये की खरीददारी पर। इसमें से अगर ८ रुपये भी बचते (इसका मतलब आप ये समझें कि आय का २० प्रतिशत अगर विज्ञापनों पर खर्च किया जाए) तो आप कुछ और सामान खरीदते। मैं जानता हूं कि आप पैसे जेब में नहीं रख पाएंगे, लेकिन अलग-अलग सामान खरीदने की आपकी ताकत, बाजार का आकार ही तो बढ़ाएगी। बाजार बड़ा होगा तो बिजनेस बड़ा होगा यानी इकोनॉमी ग्रोथ ज्यादा होगी। यही तो वित्त मंत्री चाहते हैं! ये कंपनियां ऐसा क्यों नहीं चाहतीं, पता नहीं।
सेक्सी और मादक विज्ञापन
ये ऐसा अचूक नुस्खा है जिसकी गिरफ्त से युवा ग्राहक नहीं निकल पाते। अमूल माचो का विज्ञापन हो या हाईड एंड सिक बिस्किट, या कैडबरी का प्रचार। कोई भी उत्पाद सेक्सी और मादक विज्ञापन के बिना नहीं बिक पा रहा, ऐसा कंपनियों के कर्ता-धर्ता सोचते हैं। मेरा सीधा सवाल आप ग्राहकों से है- आप सामान खरीदने दुकान जाते हैं या 'सपनेÓ खरीदने। 'सपनेÓ खरीदने के लिए २० रुपये में ब्लू फिल्म की डीवीडी कोई बुरा सौदा तो नहीं है या फिर इंटरनेट की पोर्नसाइट आपको इंटेलेक्चुअल सपने मुफ्त खरीदने से तो नहीं रोकती।
८०+२० प्रतिशत वाला ऑफर
अगर इतनी छूट है तब तो कायदे से दुकानदारों का दीवाला निकल जाना चाहिए था, लेकिन क्या आपने कभी देखा या सुना कि एक एसी दुकान खुलने के बाद बंद हो गई, या उसके मालिक के पास पहले मारुति ८०० थी तो बाद में सेंट्रो नहीं आई। कहने का आशय यह कि १२हो महीने, इतनी छूट से आपको नवाजने के बावजूद इनकी एसी लाइफस्टाइल पर कोई असर नहीं पड़ता। इसका मतलब ये हुआ कि ये दुकानदार ५ रुपये के सामान की एमआरपी पहले १०० रुपये रखते हैं। फिर ८०+२० प्रतिशत वाला ऑफर देते हैं। इस
स्कीम के हिसाब से १०० रुपये का सामान मिलेगा आपको ८४ प्रतिशत छूट के साथ १६ रुपये में। यानी दुकानदार को कायदे से तब भी २०० प्रतिशत का मुनाफा। इसी में उनका सारा मेंटिनेंस काटने-छांटने के बावजूद २० प्रतिशत का शुद्घ मुनाफा तो कहीं नहीं गया समझें। आप सोचें कि आप क्या कीमत देकर कैसा सामान खरीदकर आते हैं मॉल्स से।
रीटेलर की मार्जिन मनी बढ़ा देती हैं कंपनियां
जो कंपनियां विज्ञापनों पर बेतहाशा खर्च नहीं कर सकतीं, वे रीटेलर की मार्जिन मनी बढ़ा देती हैं। यह मार्जिन मनी १५ प्रतिशत से ५० प्रतिशत तक भी पहुंचती है। कभी-कभी तो एक पर एक फ्री यानी १०० प्रतिशत मार्जिन मनी वाला मामला रहता है। दवा और घटिया स्तर के साबुन, चाय के साथ ऐसा होता है। आप देखें कि बिस्कुट से लेकर चाय तक के पैकेट जितने छोटे हो सकते थे, हो चुके। छोटी कंपनियों के अखबारी बाइट्स बताते हैं कि वे आकार और छोटा नहीं कर सकते और बड़ी कंपनियों के मुकाबले उन्हें ठहरना भी है सो इसलिए तात्कालिक कदम के तौर वे रीटेलरों की मार्जिन मनी घटा रहे हैं, ताकि ग्राहकों की जेब से ज्यादा खर्च नहीं हो।
डोर ऑप्शंस
छोटी-छोटी कंपनियां गोबरछत्ते की तरह हर जगह उग आई हैं। २०००-३००० रुपये महीने पर इन कंपनियों को लड़के मिल जाते हैं डोर-टु-डोर विजिट करने के लिए। बिकने पर उनका कमीशन बंधा होता है। यानी वहां भी आपकी जेब से ज्यादा ही जाता है।
रात के वे फोन कॉल्स!
रात के १२ बजते ही, विभिन्न एंटरटेनमेंट और कुछ न्यूज चैनलों पर सामान बेचने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। सुंदर नारियां आपको अलग-अलग सामान दिखाकर समझाते हैं कि बाजार के बजाय उनके मार्फत खरीदने से कितना फायदा होगा आपको। आपको बस एक फोन या एसएमएस करना पड़ेगा! आपको बता दूं कि उक्त चैनलों की कमाई का यह एक बहुत बड़ा जरिया हैं। बाकी आप खुद समझदार हैं कि ये पैसे भी आपको ही देने हैं।
पार्टनरशिप!
ये पार्टनरशिप आप समझकर भी नहीं समझते। उदाहरण देता हूं। टाटा टी गोल्ड के २५० ग्राम के पैकेट पर एमआरपी लिखा है ७४ रुपये। साथ में बड़े अक्षरों में प्रिंट है- इसके साथ १० रुपये वाला मैगी का पैकेट मुफ्त! बेहतर तो यह होता कि टाटा गोल्ड अपने २५० ग्राम की कीमत ६४ रुपये ही रखती, इससे उसकी बिक्री पर क्या असर पडऩा था। लेकिन मंदी में चूंकि ग्राहक हर जगह छूट वाली चीजें देखना पसंद करने लगा है तो दो सेम प्रकृति वाली कंपनियों ने अपना टांका भिड़ा लिया और आपकी जेब में टांका फंसा दिया। और हां, अगर आप कहेंगे कि आपको मैगी नहीं चाहिए, तब भी १० रुपये नहीं कटेंगे। यहां होगी बारगेनिंग। आप कर पाए तो ठीक और वरना दुकानदार आपका चेहरा देखते हुए ८-९ रुपये काटेगा, ७४ रुपये में से।
कुछ समझे आप।
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yes.there should be a discussion on such issues.People need to know why ar they shopping and what are they shopping.It has jus become a mad rush.There has to be a logic in this.
जवाब देंहटाएंSeriuosly, it's so true..I mean look at the prices and the way the products are being promoted..recently attended a TAM workshop and can relate to this strategy fairly well..
जवाब देंहटाएंGood Analysis, I must say..
Keep lighting !!
ashish