२३,२४,२५,२६ जनवरी २०१० को क्या किया आपने। बिग बाजार से लेकर सारे बाजार में ये चार दिन सबसे सस्ते थे! ये हम नहीं कह रहे, उन दिनों, अखबारों में छपे विज्ञापनों की यह भाषा है। तो अगर ये सबसे सस्ते दिन थे तो क्या आपने खरीददारी की? इन मॉल वालों ने जिस तरह से विज्ञापनों पर पैसे लुटाए, उससे लगता है कि 'माल खूब बिका होगा। लेकिन जरा मेरी आपबीती सुन लें। २६ जनवरी को घर में आराम से सोने के बाद २७ जनवरी को बीआरटी कॉरिडोर की बस में दो सज्जन टकराए। उनमें एक एलजी, गोदरेज के सामान बेचने का काम करते थे, जबकि दूसरा किसी शॉपी १८ वाले सेंटर में। शॉपी वाला कह रहा था, 'यार, हालत यह हो गई है कि डीलर प्राइस पर सामान बेचना पड़ रहा है और उसमें भी मुसीबत है। दूसरे ने जवाब में कहा, 'परसों मैंने अपने सीनियर को बॉस से खूब डांट पिलाई। हुआ ये कि मैंने एक ग्राहक को वेब कैम फाइनल कर दिया। इतने में मेरा सीनियर आकर उसे फिर से वेब कैम घुमाकर दिखाने लगा। मैंने बॉस से जाकर कहा कि ग्राहक तैयार है, अब ये फिर से माल के बारे में बता रहा है, गड़बड़ी हुई तो मेरी जिम्मेदारी नहीं। उस लड़के की भाषा में बॉस ने उस सीनियर की जमकर 'ली और उसे ग्राउंड फ्लोर पर जाने से मना कर दिया। आप भी मुझसे इत्तफाक रखेंगे कि अगर उन दोनों सेल्स पर्सन की आपसी बातचीत सही थी तो नई दिल्ली में कंज्यूमर गुड्स सेक्टर कितने अच्छे हालात से गुजर रहा है।
पहले तो ये समझें कि सबसे सस्ते ४ दिन ही क्यों?
पांच दिन क्यों नहीं, या तीन दिन क्यों नहीं। इसका सरल जवाब है-२३ जनवरी को शनिवार था और २६ जनवरी को मंगलवार। सरकारी, अद्र्घसरकारी, कॉरपोरेट, आईटी सेक्टर से जुड़े नौकरीपेशेवरों ने अगर सोमवार की छुट्टी की तो वे इसका मतलब हुआ कि उन्होंने पूरे चार दिन की छुट्टी एक साथ ली। इस कड़क सर्दी में वे लांग टूर का प्रोग्राम तो बना नहीं सकते थे, अलबत्ता वे मॉल्स जाकर सिनेमा का लुत्फ जरूर ले रहे थे विद फैमिली। तो भैया जब आप मॉल जा रहे हैं सिनेमा देखने तो मॉल में बैठा बिग बाजार आपको देखकर लार तो टपकाएगा नहीं, बल्कि उल्टा वह आपके मुंह से लार टपकाकर अपनी जेब भरेगा। सो तमाम बड़े रीटेल शॉप्स ने कहा- सबसे सस्ते ४ दिन! लेकिन बिक्री कितनी हुई होगी इनकी, इसका अंदाजा सेल ब्वॉयज की उपर्युक्त बातचीत से आप लगाएं।
सस्ता कुछ नहीं होता, बस 'महंगा थोड़ा कम होता है
एक चीज आप गांठ बांध लें कि दुकानदार को मुनाफा छोड़ कुछ और सुनाई नहीं देता। ऐसे में वे सस्ती सर्विस आपको कैसे दे सकते हैं। और यह भी सच है कि आपकी समझ में आ जाए कि महंगा है तो आप जरूरी होने पर भी सामान नहीं खरीदेंगे। ऐसे में बाजार क्या नुस्खे अपनाता है। आइए कुछ उदाहरणों से समझते हैं।
पहले १० रामबाण समझ लें बाजार के।
पहला, वह चुपके से मात्रा कम करता चला जाता है।
दूसरा, पैकेट्स छोटे-से-छोटा होते चले जाते हैं।
तीसरा, वह चालाकी से गुणवत्ता में कमी करता चला जाता है और आपको इसकी भनक भी नहीं लगने देता।
चौथा, वह ब्रांड एंबेसेडर के सहारे माल खरीदने के लिए आपको मजबूर करता है। आप ये न सोचें कि ब्रांड एंबेसेडर केवल आमिर खान या अमिताभ होते हैं, ब्रांड एंबेसेडर हेल्थ केयर फाउंडेशन और इंडियन डेंटल एसोसिएशन भी होते हैं।
पांचवां, आकर्षक, सेक्सी और मादक विज्ञापनों से वह आपके अद्र्घचेतन में दबी सेक्स-इच्छा को सामान के यूज से जोड़ देता है। अमूल माचो का विज्ञापन याद है, हाईड एंड सिक बिस्किट के विज्ञापन में रितिक रौशन और लड़की के मादक डांस देख आपके पैर नहीं थिरकते क्या!
ंछठा, जब यह तीर भी चुक जाता है तो भारी-भरकम ऑफरों की बरसात कर देता है। आपको लगता है लूट मची है, लेकिन याद रखें ८०+२० प्रतिशत की छूट के बावजूद दुकानदार का एसी हमेशा ऑन रहता है। यानी तब भी वह घाटे में नहीं है!
सातवां, बाजार दाम तो नहीं घटाता है लेकिन रीटेल शॉपर्स की मार्जिन मनी बढ़ा देता है। नतीजा यह होता है कि ज्यादा मार्जिन वाले सामान की भरमार हो जाती है उस दुकान में, जहां से आप महीने भर के लिए उधारी सामान ले जाते हैं। जब उधार में सामान लेना है तो जाहिर है आपकी नहीं चलेगी, दुकानदार की चलेगी। आप शंका करेंगे तो दुकानदार अपनी गारंटी पर सामान देगा, आप कैसे इंकार करेंगे?
आठवां, डोर ऑप्शन तो खुला पड़ा है गृहिणियों को लुभाने के लिए।
नौवां, रात के १२ बजे के बाद कमोबेश सभी एंटरटेनमेंंट और छुटभैये न्यूज चैनलों पर आपको सामान चूज करके फोन करने को कहा जाता है। बताया जाता है कि इससे कितना फायदा होगा आपको। और हां, यह भी होम डिलेवरी वाला ऑप्शन है।
दसवां, साझेदारी का विकल्प!
अब आइए जरा सेग्मेंट वाइज ये समझते हैं कि बाजार कैसे आपकी गाढ़ी कमाई चुराता है और आपको पता भी नहीं चलता।
मात्रा/भार/वजन/इनग्रेडिएंट्स का गड़बड़झाला
आज से कुछ साल पहले तक किलोग्राम १००० ग्राम का होता था। बाद में वह जब लिटर में कन्वर्ट हुआ तो घटते-घटते ९०० ग्राम का हो गया। अब जो आप एक लिटर सरसों तेल या घी आदि खरीदते हैं वह १०० ग्राम कम खरीदते हैं यानी कायदे से १०० ग्राम की ज्यादा मात्रा के पैसे चुकाते हैं।
आप साबुन को लें। उसके इंग्रेडिएंट्स में ञ्जस्नरू (टोटल फैट मैटर) की प्रमुख भूमिका होती है। टोटल फैट मैटर का आपके लिए अर्थ ये है कि ये ञ्जस्नरू जितना ज्यादा होगा, साबुन उतना ही मुलायम होगा। यानी वह आपकी स्किन के लिए उतना ही लाभकारी होगा। ये ञ्जस्नरू ७६ प्रतिशत हो तो समझें आपकी स्किन को इससे नुकसान नहीं पहुंचेगा, इससे ज्यादा हो तो समझें कि इससे त्वचा की नमी बनी रहेगी। जैसे कि डव साबुन।
अभी पिछले कुछ दिनों पहले से कहा जा रहा है कि डेटॉल साबुन स्वाइन फ्लू से लडऩे में मददगार है। सही-गलत तो भगवान जानें, लेकिन इसका ञ्जस्नरू शायद ही कभी ७६ प्रतिशत को टच करता है। नॉर्मली यह ७१ प्रतिशत पर अटका रहता है।
छोटे पैकेट्स
अभी विज्ञापन में शाहरुख खान कह रहे हैं मर्दों की सख्त त्वचा के लिए दुनिया का नंबर वन ब्रांड फेयनेस क्रीम मात्र ७ रुपये में! आप बस उस पैकेट पर ध्यान दें, जो उनके हाथ में है। उसका आकार अब तक का सबसे छोटा है। गांवों में शैंपू, सर्फ, फेयर एंड लवली, लिप गार्ड आदि ५० पैसे से लेकर १ रुपये के सैशे में मिल रहा है। रीजन साफ है अगर ग्राहक के पास केवल ५० पैसे हैं तो बाजार ५० पैसे में ही सैशे तैयार
करके उसके घर पर हाजिर है। मात्रा कभी ३.५ मिलीलिटर तो कभी ५ मिलीलिटर तो कभी ७ मिलीलिटर। इसलिए सोच लें कि सस्ता पड़ा या महंगा। चिक और डाबर वाटिका- ये दो ऐसे शैंपू हैं जो ग्रामीण बाजार में ५० पैसे में भी उपलब्ध हैं। और हां, इसके खरीददारों की कमी नहीं है।
गुणवत्ता में कमी
पहले तो आप जान लें कि अगर आप रोजना अखबार खरीदते हैं तो निवेशक तो हैं ही आप। अब इस पर मेरी जानकारी लें कि पिछले एक साल से मंदी और घटते विज्ञापनों के नाम पर अधिकांश बड़े अखबारों के एक्सट्रा पेजेज घटा दिए गए, उनके पेजेज की क्वालिटी घटा दी गई, लेकिन दाम जरूर बढ़ा दिए गए। २००९-१० की तीसरी तिमाही के हिंदुस्तान आदि के आर्थिक रिजल्ट बताते हैं कि वे घाटे में नहीं रहे, बल्कि उनकी विज्ञापनों से हुई बढ़ी, तो ऐसे में पेपर के दाम बढ़ाने का क्या औचित्य था। आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूं।
ब्रांड एंबेसेडर की भारी कीमत आप अदा करते हैं
इसे समझने के लिए सिर्फ एक उदाहरण दूंगा कि वर्तमान वित्त सत्र की दूसरी तिमाही में हिंदुस्तान लीवर जैसी कुज्यूमर और प्रीमियर गुड्स निर्माता कंपनी की जितनी आय थी, उससे ज्याद रकम उन्होंने विज्ञापनों पर खर्च किए थे। आप सिर्फ यह तर्क करें कि हिंदुस्तान लीवर जैसी ब्रांडेड कंपनी अपनी आय से ज्यादा ब्रांडिंग पर खर्च करे तो यह आपके साथ ज्यादती नहीं है? फर्ज करें कि इन कंपनियों को १०० में १० रुपये का शुद्घ लाभ हुआ यानी कि इन्होंने कम-से-कम ११ रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए। तो हम-आप ग्राहकों की जेब से तो २० रुपये ज्यादा निकल गए न १०० रुपये की खरीददारी पर। इसमें से अगर ८ रुपये भी बचते (इसका मतलब आप ये समझें कि आय का २० प्रतिशत अगर विज्ञापनों पर खर्च किया जाए) तो आप कुछ और सामान खरीदते। मैं जानता हूं कि आप पैसे जेब में नहीं रख पाएंगे, लेकिन अलग-अलग सामान खरीदने की आपकी ताकत, बाजार का आकार ही तो बढ़ाएगी। बाजार बड़ा होगा तो बिजनेस बड़ा होगा यानी इकोनॉमी ग्रोथ ज्यादा होगी। यही तो वित्त मंत्री चाहते हैं! ये कंपनियां ऐसा क्यों नहीं चाहतीं, पता नहीं।
सेक्सी और मादक विज्ञापन
ये ऐसा अचूक नुस्खा है जिसकी गिरफ्त से युवा ग्राहक नहीं निकल पाते। अमूल माचो का विज्ञापन हो या हाईड एंड सिक बिस्किट, या कैडबरी का प्रचार। कोई भी उत्पाद सेक्सी और मादक विज्ञापन के बिना नहीं बिक पा रहा, ऐसा कंपनियों के कर्ता-धर्ता सोचते हैं। मेरा सीधा सवाल आप ग्राहकों से है- आप सामान खरीदने दुकान जाते हैं या 'सपनेÓ खरीदने। 'सपनेÓ खरीदने के लिए २० रुपये में ब्लू फिल्म की डीवीडी कोई बुरा सौदा तो नहीं है या फिर इंटरनेट की पोर्नसाइट आपको इंटेलेक्चुअल सपने मुफ्त खरीदने से तो नहीं रोकती।
८०+२० प्रतिशत वाला ऑफर
अगर इतनी छूट है तब तो कायदे से दुकानदारों का दीवाला निकल जाना चाहिए था, लेकिन क्या आपने कभी देखा या सुना कि एक एसी दुकान खुलने के बाद बंद हो गई, या उसके मालिक के पास पहले मारुति ८०० थी तो बाद में सेंट्रो नहीं आई। कहने का आशय यह कि १२हो महीने, इतनी छूट से आपको नवाजने के बावजूद इनकी एसी लाइफस्टाइल पर कोई असर नहीं पड़ता। इसका मतलब ये हुआ कि ये दुकानदार ५ रुपये के सामान की एमआरपी पहले १०० रुपये रखते हैं। फिर ८०+२० प्रतिशत वाला ऑफर देते हैं। इस
स्कीम के हिसाब से १०० रुपये का सामान मिलेगा आपको ८४ प्रतिशत छूट के साथ १६ रुपये में। यानी दुकानदार को कायदे से तब भी २०० प्रतिशत का मुनाफा। इसी में उनका सारा मेंटिनेंस काटने-छांटने के बावजूद २० प्रतिशत का शुद्घ मुनाफा तो कहीं नहीं गया समझें। आप सोचें कि आप क्या कीमत देकर कैसा सामान खरीदकर आते हैं मॉल्स से।
रीटेलर की मार्जिन मनी बढ़ा देती हैं कंपनियां
जो कंपनियां विज्ञापनों पर बेतहाशा खर्च नहीं कर सकतीं, वे रीटेलर की मार्जिन मनी बढ़ा देती हैं। यह मार्जिन मनी १५ प्रतिशत से ५० प्रतिशत तक भी पहुंचती है। कभी-कभी तो एक पर एक फ्री यानी १०० प्रतिशत मार्जिन मनी वाला मामला रहता है। दवा और घटिया स्तर के साबुन, चाय के साथ ऐसा होता है। आप देखें कि बिस्कुट से लेकर चाय तक के पैकेट जितने छोटे हो सकते थे, हो चुके। छोटी कंपनियों के अखबारी बाइट्स बताते हैं कि वे आकार और छोटा नहीं कर सकते और बड़ी कंपनियों के मुकाबले उन्हें ठहरना भी है सो इसलिए तात्कालिक कदम के तौर वे रीटेलरों की मार्जिन मनी घटा रहे हैं, ताकि ग्राहकों की जेब से ज्यादा खर्च नहीं हो।
डोर ऑप्शंस
छोटी-छोटी कंपनियां गोबरछत्ते की तरह हर जगह उग आई हैं। २०००-३००० रुपये महीने पर इन कंपनियों को लड़के मिल जाते हैं डोर-टु-डोर विजिट करने के लिए। बिकने पर उनका कमीशन बंधा होता है। यानी वहां भी आपकी जेब से ज्यादा ही जाता है।
रात के वे फोन कॉल्स!
रात के १२ बजते ही, विभिन्न एंटरटेनमेंट और कुछ न्यूज चैनलों पर सामान बेचने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। सुंदर नारियां आपको अलग-अलग सामान दिखाकर समझाते हैं कि बाजार के बजाय उनके मार्फत खरीदने से कितना फायदा होगा आपको। आपको बस एक फोन या एसएमएस करना पड़ेगा! आपको बता दूं कि उक्त चैनलों की कमाई का यह एक बहुत बड़ा जरिया हैं। बाकी आप खुद समझदार हैं कि ये पैसे भी आपको ही देने हैं।
पार्टनरशिप!
ये पार्टनरशिप आप समझकर भी नहीं समझते। उदाहरण देता हूं। टाटा टी गोल्ड के २५० ग्राम के पैकेट पर एमआरपी लिखा है ७४ रुपये। साथ में बड़े अक्षरों में प्रिंट है- इसके साथ १० रुपये वाला मैगी का पैकेट मुफ्त! बेहतर तो यह होता कि टाटा गोल्ड अपने २५० ग्राम की कीमत ६४ रुपये ही रखती, इससे उसकी बिक्री पर क्या असर पडऩा था। लेकिन मंदी में चूंकि ग्राहक हर जगह छूट वाली चीजें देखना पसंद करने लगा है तो दो सेम प्रकृति वाली कंपनियों ने अपना टांका भिड़ा लिया और आपकी जेब में टांका फंसा दिया। और हां, अगर आप कहेंगे कि आपको मैगी नहीं चाहिए, तब भी १० रुपये नहीं कटेंगे। यहां होगी बारगेनिंग। आप कर पाए तो ठीक और वरना दुकानदार आपका चेहरा देखते हुए ८-९ रुपये काटेगा, ७४ रुपये में से।
कुछ समझे आप।
बुधवार, 27 जनवरी 2010
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
where should the youth invest?
दोस्तो, आपको पता है कि मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमी किसके कंधे पर चल रही है। इसका सीधा जवाब है 'आप। आप यानी वर्कफोर्स यानी काम करनेवाली जनसंख्या। इसे दूसरे शब्दों में समझिए कि आपमें कुछ एक्स्ट्रा आर्डिनरी युवाओं को छोड़ दिया जाए तो कमोबेश सभी ५-५०००० रुपये महीना कमा रहे हैं। लेकिन महीना के अंत में ५ हजार कमानेवाले की पर्स भी खाली रहती है और ५० हजार रुपये कमानेवाले की पर्स में भी ज्यादा कुछ बचता नहीं। टैक्स से बचने के लिए वह तमाम तरह की निवेश योजनाओं में अपनी गाढ़ी कमाई फंसाने से मजबूर हो जाता है। कुछ को मॉल शॉपिंग की आदत पड़ जाती है, कुछ को विंडो शॉपिंग की, कुछ को ब्रांड शॉपिंग की। यानी कि जो आप कमाते हैं, उसे खर्च कीजिए। हंसकर या रोकर।
अभी तक आप सुनते आए थे कि शॉपिंग से तो मूड फ्रेश होता है, नई ताजगी आती है, फिर इसमें रोने का पुट कहां से आ जाता है। यह चर्चा फिर कभी। फिलहाल चर्चा इस बात की है कि मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमी कोर कंज्यूमरिज्म पर बेस्ड है। आपकी समझ के लिए, जब कोर कंज्यूमरिज्म सिर चढ़कर बोलता है तो आप एक जनवरी को जिस खर्च की प्लानिंग कर रहे होते हैं, उसकी पेमेंट एक फरवरी को मिलने वाली सेलेरी से करने की सोचते हैं। आपके दिमाग में यह बसा होता है कि वह सेलेरी तो जनवरी की है, लेकिन आप चाहकर भी याद नहीं कर पाते कि एक फरवरी को सेलेरी तो मिली जनवरी की, लेकिन फरवरी में खर्च करने के लिए, न कि जनवरी की अनपेड शॉपिंग का बिल चुकाने के लिए। यह क्रूर सच कमोबेश सभी कमाऊ उपभोक्ताओं के लिए सच है।
ऊपर के पैराग्राफ से अगर आपको कंज्यूमरिज्म पूरी तरह से समझ में आ गया हो तो मैं बताऊं कि नौकरी शुरू करने के कुछ महीने तक जब यही स्थिति होती है, तब युवा दो काम करते हैं। या तो ज्यादा सेलेरी वाली नौकरी की खोज में जुट जाते हैं (उनकी यह होड़ पूरी उम्र जारी रहती है) या फिर किसी भले मानुष (निवेश एजेंट) से टकरा जाते हैं (जॉब शुरू करने के कुछ महीनों तक में आपको निवेश के बहुत से लेक्चर मिल जाते हैं) और वह भला मानुष आपके पसीने की कमाई को किसी प्लान में फंसाकर उस पैसे को बाजार में फेंक देता है। यह बात नौकरी शुरू करनेवालों को शुरू में समझ नहीं आता, और जब आता है तब वह शेयर मार्केट की ओर मूव करता है। नौकरी से पहले उसके पास खुद का अकाउंट नहीं होता, लेकिन नौकरी शुरू होते ही वह जीमैट अकाउंट खुलवाता है और आईपीओ की खरीददारी में व्यस्त हो जाता है।
अब यहीं पेंच है। पेंच यह कि कौन सा शेयर खरीदे, कौन सा बेचे। यही हाल उनका विभिन्न निवेश योजनाओं जैसे मेडिक्लेम, मदर प्लान, फादर प्लान, चाइल्ड प्लान, मनी रिटर्न प्लान आदि नाना प्रकार के प्लान सुनकर वे पहले तो मोहित होता है (क्योंकि एजेंट उसे बताता है कि इस-इस प्लान में निवेश करके आप मजे में रोज रात पब की पार्टी एंजॉय कर सकते हैं। क्योंकि उनकी समझ में उनका फ्यूचर सिक्योर हो गया होता है।) लेकिन इसे दूसरे एंगल से देखें तो ये कहना ज्यादा सही होगा कि वे अपने पैसे सही जगह निवेश नहीं कर रहे, बल्कि उनका ऐसे निवेश में से ज्यादातर में मनमाफिक रिटर्न नहीं मिल पाता। जबकि सच यह है कि अगर आज भी आप सार्वजनिक बैंक (प्राइवेट नहीं) में निवेश करें तो लांग और शार्ट टर्म दोनों पोजिशंस में आपकी राशि पर बढ़ा हुआ मुनाफा आपको हर हाल में मिलेगा। आप याद रखें कि बाजार की इतनी बुरी हालत में भी प्रोविडेंट फंड ने ज्यादा विश्वसनीय तरीके से बेहतर कमाई दी है अपने निवेशकर्ताओं को।
आपके मन में सवाल आएगा कि शेयर मार्केट में पैसे लगाने से १०० के २०० रुपये हो जाते हैं। मैं आपसे कहूंगा कि ऐसे कितने शेयर्स के नाम याद हैं आपको जिसने साल भर में या कई साल बाद ही सही १०० के २०० कर दिए। तब आपमें से कुछ कहेंगे, शेयर मार्केट के भाव गिरने पर रेपुटेड शेयर के मालिक आपको बोनस शेयर देते हैं। जैसा कि पिछले दो सालों में पहले अनिल अंबानी ने और फिर मुकेश अंबानी ने किया। आपको क्या लगता है कि यह आप पर उपकार किया गया है? नहीं, यह सिर्फ इतना है कि मार्केट
सेंटिमेंट्स सही नहीं होने पर वे आपसे की गई अकूत कमाई से कुछ निकालकर आपको दे देते हैं, ताकि आप लंबे काल तक के लिए अपना पैसा उनके पास छोड़ सकें।
दूसरा आपने सुना होगा कि कंपनियां डिबेंचर जारी करती हैं। आपको लगता है कि यह फायदाकारक सिचुएशन है। यह सिर्फ ऐसी सिचुएशन है कि एक रुपये के सौ सिक्के की आपकी थैली में २० सिक्के निकालकर ४० अठन्नी (५० पैसे के सिक्के) रख दिए गए। एक सिक्के को एक यूनिट मानें तो आपकी थैली में अब हुए १२० यूनिट, जबकि पहले थे १०० यूनिट। कंपनी घोषणा करेगी कि उसने आपको डिबेंचर के रूप में २० यूनिट दिए। अब यह आपको सोचना है उसने दिया या लिया।
तब सवाल है आप निवेश कहां करें, क्योंकि एक बात तो सच है कि आप कमा रहे हैं इसलिए कि जरूरी खर्च से ज्यादा पैसे से, और ज्यादा पैसे कमाया जा सके। यहां याद रखें, जैसे आप ऑफिस जाने के क्रम में बीमार पड़ते हैं, कभी शादी-ब्याह में जाते हैं, कभी परिवार सहित घूमने जाते हैं तो इन दिनों की दिहाड़ी आप खोते हैं, अगर वह ऑफिस द्वारा दी गई छुट्टिïयों की संख्या से ज्यादा है तो। वैसे ही आपके निवेश का पैसा भी कभी बीमार पड़ता है, कभी उसका एक्सिडेंट (घोटाला) हो जाता है, तो कभी उसका आराम करने का मूड (बाजार में ठहराव की स्थिति, जैसे जलप्रपात से उतरते हुए पानी का तूफानी वेग विशाल झील में आकर धीमा, और धीमा हो जाता है। लोगों को लगता है कि पानी रुक गया। ऐसी ही स्थिति शेयरों के साथ भी होती है।) करता है। ऐसी हालत में आप मिलते हैं फंड मैनेजर से, सलाह मशविरा करते हैं और मौजूदा ट्रेंड के हिसाब से सटीक कैलकुलेशन करके किसी नए शेयर अथवा नए प्लान की खरीददारी करते हैं। लेकिन यहां भी आप तीन चीजें इग्नोर करते हैं। पहला फंड मैनेजर का चार्ज, दूसरा पुराने शेयर या निवेश को बेचने पर बिक्री शुल्क (एजेंट को) और तीसरा नए शेयर या नए प्लान का खरीद शुल्क। ये तीनों शुल्क आपकी असली पूंजी तोड़ते हैं और इसमें अगर पिछले शेयर्स या प्लान्स से हुआ लॉस जोड़ दें, तो आप शायद ही प्लान चेंज करें, क्योंकि ये गणना करने पर आपको दिखेगा कि आपकी कितनी करेंसी हवा में उड़ गई, जबकि सही मैनेजमेंट से आप उसके हकदार हो सकते थे।
असल में बाजार यही करता है। वह एक हाथ में ६ लिखकर आपको इस तरह दिखाता है कि आपको हर एंगल से ९ (ठीक उल्टा या कई स्थिति में काफी बढ़ा-चढ़ाकर) दिखता है। लेकिन इससे असलियत तो नहीं बदलती न। पिछले दिनों मैं एक बैंक की प्रेस कांफ्रेंस में था। उन्होंने अपने बिजनेस को सबसे पहली लाइन में हाईलाइट किया हुआ था। कार्यकारी निदेशक के संभाषण के बाद अलग से पूछा कि सर आपका बैंक जब १०० रुपये का बिजनेस करता है तो कितने रुपये का मुनाफा होता है आपको। उन्होंने जवाब नहीं दिया। यही सवाल मैंने एक नामी रीयल इस्टेट कंपनी के सीईओ से किया कि एक फ्लैट की जो कीमत आप रखते हैं, उसमें अपना मुनाफा आप जोड़ कर रखते हैं। ऑफ दि कैमरा उन्होंने कहा सही जवाब दूंगा तो इन्कम टैक्स वाले आ जाएंगे। आप देखें कि देश की अर्थव्यवस्था को गति देनेवाले ये दो मुख्य सेक्टर हैं- बैंक और रीयल इस्टेट।
बैंक और रीयल इस्टेट को छोड़ दें तो आपके पास निवेश के लिए जो सबसे ज्यादा कॉल्स आती हैं, वो हैं तमाम तरह के निवेश प्लान्स। मनी रिटर्न गारंटी प्लान्स। एक लगाओ, तीन पाओ प्लान्स। तो आप एक काम करें, जिस कंपनी का नाम आपको याद आए, उसकी पिछले पांच साल की वार्षिक रिपोर्ट चेक करें। कमोबेश सबका मुनाफा घटता यानी कायदे से घाटा बढ़ता दिखेगा। तो ऐसे में कैसे कंपनियां आपको मनमांगी रिटन्र्स देगी? मिलियन डॉलर का सवाल तो यही करें खुद से। अपनी बात के समर्थन में यह बात आपसे कहूंगा कि अभी पंजाब नेशनल बैंक ने एलआईसी और ओरिएंटल इंश्योरेंस के साथ मिलकर उनके प्लान्स बेचना शुरू किया है। अपने ग्राहकों को ये प्लान्स बेचते वक्त बैंक एजेंट वाले पैसे नहीं लेगा। यानी, प्रोडक्ट की शुरुआती छिपी हुई लागत जीरो ऊपर से बार-बार एजेंट से जुड़े होने की सिरदर्दी खत्म। हालांकि सेबी ने वैसे भी इन एजेंटों के भविष्य पर प्रश्नचिह्नï लगा दिया है।
तब सवाल उठता है निवेश कहां करेंगे आप
आधुनिक अर्थव्यवस्था के बदलते रंग आपको बताता हूं। बाकी फैसला करना आपका काम है। १८५० की औद्योगिक क्रांति के बाद जब से आधुनिक अर्थव्यवस्था शुरुआत हुई, आम लोगों की जेब से पैसे पुचकार कर/खींचकर (गंवार भाषा में कहूं तो छीनकर), पैसे कमाने, उस कमाए गए अतिरिक्त पैसे का एक जगह केंद्रीकरण करने और फिर मनोनुकूल जगह निवेश करने (सोशल सेक्टर या गुड्स सेक्टर या दोनों) और उस निवेश से पेसे कमाने (जॉब सेक्टर) के कई नुस्खे अपनाए गए। लेकिन जब आप छिपने के लिए कई चक्करदार रास्ते अपनाते हैं तो अंत में खुद आपको भी रास्ता नहीं सूझता बाहर निकलने या आगे बढऩे के लिए। अर्थव्यवस्था में जब ऐसी स्थिति आती है तो उसे मंदी कहते हैं। यह मंदी कभी महामंदी का रूप धारण कर सबकुछ मिटा देती है। जैसा १९३० और २००९ में हुआ। १९३० में कहा गया कि सप्लाई ज्यादा थी, डिमांड फोर्स नहीं था। यानी लोगों के पास पैसे नहीं थे खरीदने के लिए। ऐसे में कींस जैसे महाशय ने सुझाव दिया कि सरकार का काम है सोशल सेक्टर (ओवरब्रिज, रेल, हवाई जहाज आदि) में निवेश करना है ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोगों के पास पैसे हो सके बाजार में उपलब्ध माल खरीदने के लिए। लेकिन सरकार को बाजार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इसके बाद १९७० के दशक में फिर से एक मंदी आई। इस वक्त तक सरकारें काफी चीजें अपने नियंत्रण में रखती थीं। और तब के अर्थशास्त्रियों ने कहा कि सरकार को बाजार को हैंडिल नहीं करना आता, और उसे बाजार हैंडिल करना भी नहीं चाहिए। तब से अर्थव्यवस्था सरकारमुक्त हो गई और वाया ओलिगोपॉली, मोनीपॉली अर्थव्यवस्था में कन्वर्ट हो गई। एक हाथ से बिना ब्याज वाले कर्ज बांटे गए (अमेरिका में) और दूसरे हाथ से उसी पैसे को बाजार में लगाया गया, एक पैसे का दो जगह निवेश। यानी कि दोमुंहा बैलून। कभी तो जोड़ खुलना था, खुला तो लोगों को लगा कि एक बैलून गायब हो गया। यह दूसरा बैलून लोगों को निवेश की तरह दिखता था। यही गायब हो गया। यानी पड़ गया बुद्घु चक्कर में। २००९ का संकट इससे आया। अब कहा जा रहा है कि बाजार को उतना उन्मुक्त नहीं छोड़ा जाना चाहिए, जितना छोडऩे से राजू जैसे जेंटलमैन पैदा हो जाएं। और इस मंदी के बीच सार्वजनिक बैंकों ने डूबने के बजाय बढिय़ा बल्कि बहुत बढिय़ा बिजनेस करके अर्थव्यवस्था में जान फूंकी है। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने यह बात मानी भी कि आधुनिक अर्थव्यवस्था के मंदिर यही सार्वजनिक बैंक हैं। यह तो आपको भी पता होगा कि मुसीबत के समय जीवन बचानेवाला हथियार, निवेश का सबसे बड़ा डेस्टिनेशन होता है। अगर सरकारी नीतियों को आप गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि सरकार के ज्यादातर सोशल इंवेस्टमेंट के पैसे सार्वजनिक
बैंकों के माध्यम से निकल रहे हैं। (नरेगा प्लान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।) यानी कोशिश है कि आप खुली खरीददारी (कैश बिजनेस) के बदले बैंक के माध्यम से सारी खरीददारी करें (डेबिट कार्ड आदि से)। ताकि सरप्लस पैसा हमेशा अल्हड़ बाजार के हाथों में न जाकर सार्वजनिक बैंकों की निगरानी में रहे। अब तो ये सार्वजनिक बैंक ही निवेश का सबसे बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं। वे जीमैट अकाउंट खोल रहे हैं, निवेश प्लान सीधा बेच रहे हैं। शायद आपको कुछ रास्ता दिखा होगा।
अभी तक आप सुनते आए थे कि शॉपिंग से तो मूड फ्रेश होता है, नई ताजगी आती है, फिर इसमें रोने का पुट कहां से आ जाता है। यह चर्चा फिर कभी। फिलहाल चर्चा इस बात की है कि मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमी कोर कंज्यूमरिज्म पर बेस्ड है। आपकी समझ के लिए, जब कोर कंज्यूमरिज्म सिर चढ़कर बोलता है तो आप एक जनवरी को जिस खर्च की प्लानिंग कर रहे होते हैं, उसकी पेमेंट एक फरवरी को मिलने वाली सेलेरी से करने की सोचते हैं। आपके दिमाग में यह बसा होता है कि वह सेलेरी तो जनवरी की है, लेकिन आप चाहकर भी याद नहीं कर पाते कि एक फरवरी को सेलेरी तो मिली जनवरी की, लेकिन फरवरी में खर्च करने के लिए, न कि जनवरी की अनपेड शॉपिंग का बिल चुकाने के लिए। यह क्रूर सच कमोबेश सभी कमाऊ उपभोक्ताओं के लिए सच है।
ऊपर के पैराग्राफ से अगर आपको कंज्यूमरिज्म पूरी तरह से समझ में आ गया हो तो मैं बताऊं कि नौकरी शुरू करने के कुछ महीने तक जब यही स्थिति होती है, तब युवा दो काम करते हैं। या तो ज्यादा सेलेरी वाली नौकरी की खोज में जुट जाते हैं (उनकी यह होड़ पूरी उम्र जारी रहती है) या फिर किसी भले मानुष (निवेश एजेंट) से टकरा जाते हैं (जॉब शुरू करने के कुछ महीनों तक में आपको निवेश के बहुत से लेक्चर मिल जाते हैं) और वह भला मानुष आपके पसीने की कमाई को किसी प्लान में फंसाकर उस पैसे को बाजार में फेंक देता है। यह बात नौकरी शुरू करनेवालों को शुरू में समझ नहीं आता, और जब आता है तब वह शेयर मार्केट की ओर मूव करता है। नौकरी से पहले उसके पास खुद का अकाउंट नहीं होता, लेकिन नौकरी शुरू होते ही वह जीमैट अकाउंट खुलवाता है और आईपीओ की खरीददारी में व्यस्त हो जाता है।
अब यहीं पेंच है। पेंच यह कि कौन सा शेयर खरीदे, कौन सा बेचे। यही हाल उनका विभिन्न निवेश योजनाओं जैसे मेडिक्लेम, मदर प्लान, फादर प्लान, चाइल्ड प्लान, मनी रिटर्न प्लान आदि नाना प्रकार के प्लान सुनकर वे पहले तो मोहित होता है (क्योंकि एजेंट उसे बताता है कि इस-इस प्लान में निवेश करके आप मजे में रोज रात पब की पार्टी एंजॉय कर सकते हैं। क्योंकि उनकी समझ में उनका फ्यूचर सिक्योर हो गया होता है।) लेकिन इसे दूसरे एंगल से देखें तो ये कहना ज्यादा सही होगा कि वे अपने पैसे सही जगह निवेश नहीं कर रहे, बल्कि उनका ऐसे निवेश में से ज्यादातर में मनमाफिक रिटर्न नहीं मिल पाता। जबकि सच यह है कि अगर आज भी आप सार्वजनिक बैंक (प्राइवेट नहीं) में निवेश करें तो लांग और शार्ट टर्म दोनों पोजिशंस में आपकी राशि पर बढ़ा हुआ मुनाफा आपको हर हाल में मिलेगा। आप याद रखें कि बाजार की इतनी बुरी हालत में भी प्रोविडेंट फंड ने ज्यादा विश्वसनीय तरीके से बेहतर कमाई दी है अपने निवेशकर्ताओं को।
आपके मन में सवाल आएगा कि शेयर मार्केट में पैसे लगाने से १०० के २०० रुपये हो जाते हैं। मैं आपसे कहूंगा कि ऐसे कितने शेयर्स के नाम याद हैं आपको जिसने साल भर में या कई साल बाद ही सही १०० के २०० कर दिए। तब आपमें से कुछ कहेंगे, शेयर मार्केट के भाव गिरने पर रेपुटेड शेयर के मालिक आपको बोनस शेयर देते हैं। जैसा कि पिछले दो सालों में पहले अनिल अंबानी ने और फिर मुकेश अंबानी ने किया। आपको क्या लगता है कि यह आप पर उपकार किया गया है? नहीं, यह सिर्फ इतना है कि मार्केट
सेंटिमेंट्स सही नहीं होने पर वे आपसे की गई अकूत कमाई से कुछ निकालकर आपको दे देते हैं, ताकि आप लंबे काल तक के लिए अपना पैसा उनके पास छोड़ सकें।
दूसरा आपने सुना होगा कि कंपनियां डिबेंचर जारी करती हैं। आपको लगता है कि यह फायदाकारक सिचुएशन है। यह सिर्फ ऐसी सिचुएशन है कि एक रुपये के सौ सिक्के की आपकी थैली में २० सिक्के निकालकर ४० अठन्नी (५० पैसे के सिक्के) रख दिए गए। एक सिक्के को एक यूनिट मानें तो आपकी थैली में अब हुए १२० यूनिट, जबकि पहले थे १०० यूनिट। कंपनी घोषणा करेगी कि उसने आपको डिबेंचर के रूप में २० यूनिट दिए। अब यह आपको सोचना है उसने दिया या लिया।
तब सवाल है आप निवेश कहां करें, क्योंकि एक बात तो सच है कि आप कमा रहे हैं इसलिए कि जरूरी खर्च से ज्यादा पैसे से, और ज्यादा पैसे कमाया जा सके। यहां याद रखें, जैसे आप ऑफिस जाने के क्रम में बीमार पड़ते हैं, कभी शादी-ब्याह में जाते हैं, कभी परिवार सहित घूमने जाते हैं तो इन दिनों की दिहाड़ी आप खोते हैं, अगर वह ऑफिस द्वारा दी गई छुट्टिïयों की संख्या से ज्यादा है तो। वैसे ही आपके निवेश का पैसा भी कभी बीमार पड़ता है, कभी उसका एक्सिडेंट (घोटाला) हो जाता है, तो कभी उसका आराम करने का मूड (बाजार में ठहराव की स्थिति, जैसे जलप्रपात से उतरते हुए पानी का तूफानी वेग विशाल झील में आकर धीमा, और धीमा हो जाता है। लोगों को लगता है कि पानी रुक गया। ऐसी ही स्थिति शेयरों के साथ भी होती है।) करता है। ऐसी हालत में आप मिलते हैं फंड मैनेजर से, सलाह मशविरा करते हैं और मौजूदा ट्रेंड के हिसाब से सटीक कैलकुलेशन करके किसी नए शेयर अथवा नए प्लान की खरीददारी करते हैं। लेकिन यहां भी आप तीन चीजें इग्नोर करते हैं। पहला फंड मैनेजर का चार्ज, दूसरा पुराने शेयर या निवेश को बेचने पर बिक्री शुल्क (एजेंट को) और तीसरा नए शेयर या नए प्लान का खरीद शुल्क। ये तीनों शुल्क आपकी असली पूंजी तोड़ते हैं और इसमें अगर पिछले शेयर्स या प्लान्स से हुआ लॉस जोड़ दें, तो आप शायद ही प्लान चेंज करें, क्योंकि ये गणना करने पर आपको दिखेगा कि आपकी कितनी करेंसी हवा में उड़ गई, जबकि सही मैनेजमेंट से आप उसके हकदार हो सकते थे।
असल में बाजार यही करता है। वह एक हाथ में ६ लिखकर आपको इस तरह दिखाता है कि आपको हर एंगल से ९ (ठीक उल्टा या कई स्थिति में काफी बढ़ा-चढ़ाकर) दिखता है। लेकिन इससे असलियत तो नहीं बदलती न। पिछले दिनों मैं एक बैंक की प्रेस कांफ्रेंस में था। उन्होंने अपने बिजनेस को सबसे पहली लाइन में हाईलाइट किया हुआ था। कार्यकारी निदेशक के संभाषण के बाद अलग से पूछा कि सर आपका बैंक जब १०० रुपये का बिजनेस करता है तो कितने रुपये का मुनाफा होता है आपको। उन्होंने जवाब नहीं दिया। यही सवाल मैंने एक नामी रीयल इस्टेट कंपनी के सीईओ से किया कि एक फ्लैट की जो कीमत आप रखते हैं, उसमें अपना मुनाफा आप जोड़ कर रखते हैं। ऑफ दि कैमरा उन्होंने कहा सही जवाब दूंगा तो इन्कम टैक्स वाले आ जाएंगे। आप देखें कि देश की अर्थव्यवस्था को गति देनेवाले ये दो मुख्य सेक्टर हैं- बैंक और रीयल इस्टेट।
बैंक और रीयल इस्टेट को छोड़ दें तो आपके पास निवेश के लिए जो सबसे ज्यादा कॉल्स आती हैं, वो हैं तमाम तरह के निवेश प्लान्स। मनी रिटर्न गारंटी प्लान्स। एक लगाओ, तीन पाओ प्लान्स। तो आप एक काम करें, जिस कंपनी का नाम आपको याद आए, उसकी पिछले पांच साल की वार्षिक रिपोर्ट चेक करें। कमोबेश सबका मुनाफा घटता यानी कायदे से घाटा बढ़ता दिखेगा। तो ऐसे में कैसे कंपनियां आपको मनमांगी रिटन्र्स देगी? मिलियन डॉलर का सवाल तो यही करें खुद से। अपनी बात के समर्थन में यह बात आपसे कहूंगा कि अभी पंजाब नेशनल बैंक ने एलआईसी और ओरिएंटल इंश्योरेंस के साथ मिलकर उनके प्लान्स बेचना शुरू किया है। अपने ग्राहकों को ये प्लान्स बेचते वक्त बैंक एजेंट वाले पैसे नहीं लेगा। यानी, प्रोडक्ट की शुरुआती छिपी हुई लागत जीरो ऊपर से बार-बार एजेंट से जुड़े होने की सिरदर्दी खत्म। हालांकि सेबी ने वैसे भी इन एजेंटों के भविष्य पर प्रश्नचिह्नï लगा दिया है।
तब सवाल उठता है निवेश कहां करेंगे आप
आधुनिक अर्थव्यवस्था के बदलते रंग आपको बताता हूं। बाकी फैसला करना आपका काम है। १८५० की औद्योगिक क्रांति के बाद जब से आधुनिक अर्थव्यवस्था शुरुआत हुई, आम लोगों की जेब से पैसे पुचकार कर/खींचकर (गंवार भाषा में कहूं तो छीनकर), पैसे कमाने, उस कमाए गए अतिरिक्त पैसे का एक जगह केंद्रीकरण करने और फिर मनोनुकूल जगह निवेश करने (सोशल सेक्टर या गुड्स सेक्टर या दोनों) और उस निवेश से पेसे कमाने (जॉब सेक्टर) के कई नुस्खे अपनाए गए। लेकिन जब आप छिपने के लिए कई चक्करदार रास्ते अपनाते हैं तो अंत में खुद आपको भी रास्ता नहीं सूझता बाहर निकलने या आगे बढऩे के लिए। अर्थव्यवस्था में जब ऐसी स्थिति आती है तो उसे मंदी कहते हैं। यह मंदी कभी महामंदी का रूप धारण कर सबकुछ मिटा देती है। जैसा १९३० और २००९ में हुआ। १९३० में कहा गया कि सप्लाई ज्यादा थी, डिमांड फोर्स नहीं था। यानी लोगों के पास पैसे नहीं थे खरीदने के लिए। ऐसे में कींस जैसे महाशय ने सुझाव दिया कि सरकार का काम है सोशल सेक्टर (ओवरब्रिज, रेल, हवाई जहाज आदि) में निवेश करना है ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोगों के पास पैसे हो सके बाजार में उपलब्ध माल खरीदने के लिए। लेकिन सरकार को बाजार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इसके बाद १९७० के दशक में फिर से एक मंदी आई। इस वक्त तक सरकारें काफी चीजें अपने नियंत्रण में रखती थीं। और तब के अर्थशास्त्रियों ने कहा कि सरकार को बाजार को हैंडिल नहीं करना आता, और उसे बाजार हैंडिल करना भी नहीं चाहिए। तब से अर्थव्यवस्था सरकारमुक्त हो गई और वाया ओलिगोपॉली, मोनीपॉली अर्थव्यवस्था में कन्वर्ट हो गई। एक हाथ से बिना ब्याज वाले कर्ज बांटे गए (अमेरिका में) और दूसरे हाथ से उसी पैसे को बाजार में लगाया गया, एक पैसे का दो जगह निवेश। यानी कि दोमुंहा बैलून। कभी तो जोड़ खुलना था, खुला तो लोगों को लगा कि एक बैलून गायब हो गया। यह दूसरा बैलून लोगों को निवेश की तरह दिखता था। यही गायब हो गया। यानी पड़ गया बुद्घु चक्कर में। २००९ का संकट इससे आया। अब कहा जा रहा है कि बाजार को उतना उन्मुक्त नहीं छोड़ा जाना चाहिए, जितना छोडऩे से राजू जैसे जेंटलमैन पैदा हो जाएं। और इस मंदी के बीच सार्वजनिक बैंकों ने डूबने के बजाय बढिय़ा बल्कि बहुत बढिय़ा बिजनेस करके अर्थव्यवस्था में जान फूंकी है। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने यह बात मानी भी कि आधुनिक अर्थव्यवस्था के मंदिर यही सार्वजनिक बैंक हैं। यह तो आपको भी पता होगा कि मुसीबत के समय जीवन बचानेवाला हथियार, निवेश का सबसे बड़ा डेस्टिनेशन होता है। अगर सरकारी नीतियों को आप गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि सरकार के ज्यादातर सोशल इंवेस्टमेंट के पैसे सार्वजनिक
बैंकों के माध्यम से निकल रहे हैं। (नरेगा प्लान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।) यानी कोशिश है कि आप खुली खरीददारी (कैश बिजनेस) के बदले बैंक के माध्यम से सारी खरीददारी करें (डेबिट कार्ड आदि से)। ताकि सरप्लस पैसा हमेशा अल्हड़ बाजार के हाथों में न जाकर सार्वजनिक बैंकों की निगरानी में रहे। अब तो ये सार्वजनिक बैंक ही निवेश का सबसे बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं। वे जीमैट अकाउंट खोल रहे हैं, निवेश प्लान सीधा बेच रहे हैं। शायद आपको कुछ रास्ता दिखा होगा।
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