गुरुवार, 21 जनवरी 2010

where should the youth invest?

दोस्तो, आपको पता है कि मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमी किसके कंधे पर चल रही है। इसका सीधा जवाब है 'आप। आप यानी वर्कफोर्स यानी काम करनेवाली जनसंख्या। इसे दूसरे शब्दों में समझिए कि आपमें कुछ एक्स्ट्रा आर्डिनरी युवाओं को छोड़ दिया जाए तो कमोबेश सभी ५-५०००० रुपये महीना कमा रहे हैं। लेकिन महीना के अंत में ५ हजार कमानेवाले की पर्स भी खाली रहती है और ५० हजार रुपये कमानेवाले की पर्स में भी ज्यादा कुछ बचता नहीं। टैक्स से बचने के लिए वह तमाम तरह की निवेश योजनाओं में अपनी गाढ़ी कमाई फंसाने से मजबूर हो जाता है। कुछ को मॉल शॉपिंग की आदत पड़ जाती है, कुछ को विंडो शॉपिंग की, कुछ को ब्रांड शॉपिंग की। यानी कि जो आप कमाते हैं, उसे खर्च कीजिए। हंसकर या रोकर।
अभी तक आप सुनते आए थे कि शॉपिंग से तो मूड फ्रेश होता है, नई ताजगी आती है, फिर इसमें रोने का पुट कहां से आ जाता है। यह चर्चा फिर कभी। फिलहाल चर्चा इस बात की है कि मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमी कोर कंज्यूमरिज्म पर बेस्ड है। आपकी समझ के लिए, जब कोर कंज्यूमरिज्म सिर चढ़कर बोलता है तो आप एक जनवरी को जिस खर्च की प्लानिंग कर रहे होते हैं, उसकी पेमेंट एक फरवरी को मिलने वाली सेलेरी से करने की सोचते हैं। आपके दिमाग में यह बसा होता है कि वह सेलेरी तो जनवरी की है, लेकिन आप चाहकर भी याद नहीं कर पाते कि एक फरवरी को सेलेरी तो मिली जनवरी की, लेकिन फरवरी में खर्च करने के लिए, न कि जनवरी की अनपेड शॉपिंग का बिल चुकाने के लिए। यह क्रूर सच कमोबेश सभी कमाऊ उपभोक्ताओं के लिए सच है।
ऊपर के पैराग्राफ से अगर आपको कंज्यूमरिज्म पूरी तरह से समझ में आ गया हो तो मैं बताऊं कि नौकरी शुरू करने के कुछ महीने तक जब यही स्थिति होती है, तब युवा दो काम करते हैं। या तो ज्यादा सेलेरी वाली नौकरी की खोज में जुट जाते हैं (उनकी यह होड़ पूरी उम्र जारी रहती है) या फिर किसी भले मानुष (निवेश एजेंट) से टकरा जाते हैं (जॉब शुरू करने के कुछ महीनों तक में आपको निवेश के बहुत से लेक्चर मिल जाते हैं) और वह भला मानुष आपके पसीने की कमाई को किसी प्लान में फंसाकर उस पैसे को बाजार में फेंक देता है। यह बात नौकरी शुरू करनेवालों को शुरू में समझ नहीं आता, और जब आता है तब वह शेयर मार्केट की ओर मूव करता है। नौकरी से पहले उसके पास खुद का अकाउंट नहीं होता, लेकिन नौकरी शुरू होते ही वह जीमैट अकाउंट खुलवाता है और आईपीओ की खरीददारी में व्यस्त हो जाता है।
अब यहीं पेंच है। पेंच यह कि कौन सा शेयर खरीदे, कौन सा बेचे। यही हाल उनका विभिन्न निवेश योजनाओं जैसे मेडिक्लेम, मदर प्लान, फादर प्लान, चाइल्ड प्लान, मनी रिटर्न प्लान आदि नाना प्रकार के प्लान सुनकर वे पहले तो मोहित होता है (क्योंकि एजेंट उसे बताता है कि इस-इस प्लान में निवेश करके आप मजे में रोज रात पब की पार्टी एंजॉय कर सकते हैं। क्योंकि उनकी समझ में उनका फ्यूचर सिक्योर हो गया होता है।) लेकिन इसे दूसरे एंगल से देखें तो ये कहना ज्यादा सही होगा कि वे अपने पैसे सही जगह निवेश नहीं कर रहे, बल्कि उनका ऐसे निवेश में से ज्यादातर में मनमाफिक रिटर्न नहीं मिल पाता। जबकि सच यह है कि अगर आज भी आप सार्वजनिक बैंक (प्राइवेट नहीं) में निवेश करें तो लांग और शार्ट टर्म दोनों पोजिशंस में आपकी राशि पर बढ़ा हुआ मुनाफा आपको हर हाल में मिलेगा। आप याद रखें कि बाजार की इतनी बुरी हालत में भी प्रोविडेंट फंड ने ज्यादा विश्वसनीय तरीके से बेहतर कमाई दी है अपने निवेशकर्ताओं को।
आपके मन में सवाल आएगा कि शेयर मार्केट में पैसे लगाने से १०० के २०० रुपये हो जाते हैं। मैं आपसे कहूंगा कि ऐसे कितने शेयर्स के नाम याद हैं आपको जिसने साल भर में या कई साल बाद ही सही १०० के २०० कर दिए। तब आपमें से कुछ कहेंगे, शेयर मार्केट के भाव गिरने पर रेपुटेड शेयर के मालिक आपको बोनस शेयर देते हैं। जैसा कि पिछले दो सालों में पहले अनिल अंबानी ने और फिर मुकेश अंबानी ने किया। आपको क्या लगता है कि यह आप पर उपकार किया गया है? नहीं, यह सिर्फ इतना है कि मार्केट
सेंटिमेंट्स सही नहीं होने पर वे आपसे की गई अकूत कमाई से कुछ निकालकर आपको दे देते हैं, ताकि आप लंबे काल तक के लिए अपना पैसा उनके पास छोड़ सकें।
दूसरा आपने सुना होगा कि कंपनियां डिबेंचर जारी करती हैं। आपको लगता है कि यह फायदाकारक सिचुएशन है। यह सिर्फ ऐसी सिचुएशन है कि एक रुपये के सौ सिक्के की आपकी थैली में २० सिक्के निकालकर ४० अठन्नी (५० पैसे के सिक्के) रख दिए गए। एक सिक्के को एक यूनिट मानें तो आपकी थैली में अब हुए १२० यूनिट, जबकि पहले थे १०० यूनिट। कंपनी घोषणा करेगी कि उसने आपको डिबेंचर के रूप में २० यूनिट दिए। अब यह आपको सोचना है उसने दिया या लिया।
तब सवाल है आप निवेश कहां करें, क्योंकि एक बात तो सच है कि आप कमा रहे हैं इसलिए कि जरूरी खर्च से ज्यादा पैसे से, और ज्यादा पैसे कमाया जा सके। यहां याद रखें, जैसे आप ऑफिस जाने के क्रम में बीमार पड़ते हैं, कभी शादी-ब्याह में जाते हैं, कभी परिवार सहित घूमने जाते हैं तो इन दिनों की दिहाड़ी आप खोते हैं, अगर वह ऑफिस द्वारा दी गई छुट्टिïयों की संख्या से ज्यादा है तो। वैसे ही आपके निवेश का पैसा भी कभी बीमार पड़ता है, कभी उसका एक्सिडेंट (घोटाला) हो जाता है, तो कभी उसका आराम करने का मूड (बाजार में ठहराव की स्थिति, जैसे जलप्रपात से उतरते हुए पानी का तूफानी वेग विशाल झील में आकर धीमा, और धीमा हो जाता है। लोगों को लगता है कि पानी रुक गया। ऐसी ही स्थिति शेयरों के साथ भी होती है।) करता है। ऐसी हालत में आप मिलते हैं फंड मैनेजर से, सलाह मशविरा करते हैं और मौजूदा ट्रेंड के हिसाब से सटीक कैलकुलेशन करके किसी नए शेयर अथवा नए प्लान की खरीददारी करते हैं। लेकिन यहां भी आप तीन चीजें इग्नोर करते हैं। पहला फंड मैनेजर का चार्ज, दूसरा पुराने शेयर या निवेश को बेचने पर बिक्री शुल्क (एजेंट को) और तीसरा नए शेयर या नए प्लान का खरीद शुल्क। ये तीनों शुल्क आपकी असली पूंजी तोड़ते हैं और इसमें अगर पिछले शेयर्स या प्लान्स से हुआ लॉस जोड़ दें, तो आप शायद ही प्लान चेंज करें, क्योंकि ये गणना करने पर आपको दिखेगा कि आपकी कितनी करेंसी हवा में उड़ गई, जबकि सही मैनेजमेंट से आप उसके हकदार हो सकते थे।
असल में बाजार यही करता है। वह एक हाथ में ६ लिखकर आपको इस तरह दिखाता है कि आपको हर एंगल से ९ (ठीक उल्टा या कई स्थिति में काफी बढ़ा-चढ़ाकर) दिखता है। लेकिन इससे असलियत तो नहीं बदलती न। पिछले दिनों मैं एक बैंक की प्रेस कांफ्रेंस में था। उन्होंने अपने बिजनेस को सबसे पहली लाइन में हाईलाइट किया हुआ था। कार्यकारी निदेशक के संभाषण के बाद अलग से पूछा कि सर आपका बैंक जब १०० रुपये का बिजनेस करता है तो कितने रुपये का मुनाफा होता है आपको। उन्होंने जवाब नहीं दिया। यही सवाल मैंने एक नामी रीयल इस्टेट कंपनी के सीईओ से किया कि एक फ्लैट की जो कीमत आप रखते हैं, उसमें अपना मुनाफा आप जोड़ कर रखते हैं। ऑफ दि कैमरा उन्होंने कहा सही जवाब दूंगा तो इन्कम टैक्स वाले आ जाएंगे। आप देखें कि देश की अर्थव्यवस्था को गति देनेवाले ये दो मुख्य सेक्टर हैं- बैंक और रीयल इस्टेट।

बैंक और रीयल इस्टेट को छोड़ दें तो आपके पास निवेश के लिए जो सबसे ज्यादा कॉल्स आती हैं, वो हैं तमाम तरह के निवेश प्लान्स। मनी रिटर्न गारंटी प्लान्स। एक लगाओ, तीन पाओ प्लान्स। तो आप एक काम करें, जिस कंपनी का नाम आपको याद आए, उसकी पिछले पांच साल की वार्षिक रिपोर्ट चेक करें। कमोबेश सबका मुनाफा घटता यानी कायदे से घाटा बढ़ता दिखेगा। तो ऐसे में कैसे कंपनियां आपको मनमांगी रिटन्र्स देगी? मिलियन डॉलर का सवाल तो यही करें खुद से। अपनी बात के समर्थन में यह बात आपसे कहूंगा कि अभी पंजाब नेशनल बैंक ने एलआईसी और ओरिएंटल इंश्योरेंस के साथ मिलकर उनके प्लान्स बेचना शुरू किया है। अपने ग्राहकों को ये प्लान्स बेचते वक्त बैंक एजेंट वाले पैसे नहीं लेगा। यानी, प्रोडक्ट की शुरुआती छिपी हुई लागत जीरो ऊपर से बार-बार एजेंट से जुड़े होने की सिरदर्दी खत्म। हालांकि सेबी ने वैसे भी इन एजेंटों के भविष्य पर प्रश्नचिह्नï लगा दिया है।
तब सवाल उठता है निवेश कहां करेंगे आप
आधुनिक अर्थव्यवस्था के बदलते रंग आपको बताता हूं। बाकी फैसला करना आपका काम है। १८५० की औद्योगिक क्रांति के बाद जब से आधुनिक अर्थव्यवस्था शुरुआत हुई, आम लोगों की जेब से पैसे पुचकार कर/खींचकर (गंवार भाषा में कहूं तो छीनकर), पैसे कमाने, उस कमाए गए अतिरिक्त पैसे का एक जगह केंद्रीकरण करने और फिर मनोनुकूल जगह निवेश करने (सोशल सेक्टर या गुड्स सेक्टर या दोनों) और उस निवेश से पेसे कमाने (जॉब सेक्टर) के कई नुस्खे अपनाए गए। लेकिन जब आप छिपने के लिए कई चक्करदार रास्ते अपनाते हैं तो अंत में खुद आपको भी रास्ता नहीं सूझता बाहर निकलने या आगे बढऩे के लिए। अर्थव्यवस्था में जब ऐसी स्थिति आती है तो उसे मंदी कहते हैं। यह मंदी कभी महामंदी का रूप धारण कर सबकुछ मिटा देती है। जैसा १९३० और २००९ में हुआ। १९३० में कहा गया कि सप्लाई ज्यादा थी, डिमांड फोर्स नहीं था। यानी लोगों के पास पैसे नहीं थे खरीदने के लिए। ऐसे में कींस जैसे महाशय ने सुझाव दिया कि सरकार का काम है सोशल सेक्टर (ओवरब्रिज, रेल, हवाई जहाज आदि) में निवेश करना है ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोगों के पास पैसे हो सके बाजार में उपलब्ध माल खरीदने के लिए। लेकिन सरकार को बाजार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इसके बाद १९७० के दशक में फिर से एक मंदी आई। इस वक्त तक सरकारें काफी चीजें अपने नियंत्रण में रखती थीं। और तब के अर्थशास्त्रियों ने कहा कि सरकार को बाजार को हैंडिल नहीं करना आता, और उसे बाजार हैंडिल करना भी नहीं चाहिए। तब से अर्थव्यवस्था सरकारमुक्त हो गई और वाया ओलिगोपॉली, मोनीपॉली अर्थव्यवस्था में कन्वर्ट हो गई। एक हाथ से बिना ब्याज वाले कर्ज बांटे गए (अमेरिका में) और दूसरे हाथ से उसी पैसे को बाजार में लगाया गया, एक पैसे का दो जगह निवेश। यानी कि दोमुंहा बैलून। कभी तो जोड़ खुलना था, खुला तो लोगों को लगा कि एक बैलून गायब हो गया। यह दूसरा बैलून लोगों को निवेश की तरह दिखता था। यही गायब हो गया। यानी पड़ गया बुद्घु चक्कर में। २००९ का संकट इससे आया। अब कहा जा रहा है कि बाजार को उतना उन्मुक्त नहीं छोड़ा जाना चाहिए, जितना छोडऩे से राजू जैसे जेंटलमैन पैदा हो जाएं। और इस मंदी के बीच सार्वजनिक बैंकों ने डूबने के बजाय बढिय़ा बल्कि बहुत बढिय़ा बिजनेस करके अर्थव्यवस्था में जान फूंकी है। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने यह बात मानी भी कि आधुनिक अर्थव्यवस्था के मंदिर यही सार्वजनिक बैंक हैं। यह तो आपको भी पता होगा कि मुसीबत के समय जीवन बचानेवाला हथियार, निवेश का सबसे बड़ा डेस्टिनेशन होता है। अगर सरकारी नीतियों को आप गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि सरकार के ज्यादातर सोशल इंवेस्टमेंट के पैसे सार्वजनिक

बैंकों के माध्यम से निकल रहे हैं। (नरेगा प्लान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।) यानी कोशिश है कि आप खुली खरीददारी (कैश बिजनेस) के बदले बैंक के माध्यम से सारी खरीददारी करें (डेबिट कार्ड आदि से)। ताकि सरप्लस पैसा हमेशा अल्हड़ बाजार के हाथों में न जाकर सार्वजनिक बैंकों की निगरानी में रहे। अब तो ये सार्वजनिक बैंक ही निवेश का सबसे बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं। वे जीमैट अकाउंट खोल रहे हैं, निवेश प्लान सीधा बेच रहे हैं। शायद आपको कुछ रास्ता दिखा होगा।

1 टिप्पणी: